Saturday, 11 January 2020

जग के तुफानो में

जग के तुफानो में
मजबूत पेड़ भी उखड़ते,..
फिर अंकुरित हो जड़ो से,
 नये तनै बनते है,...
मिट जाती हैं जल कि धारा
जो कल कल कर बहती,..
सूर्य ऊष्मा से हो वाष्पीकरण,..
बादल के संग 
फिर वर्ष बन बहती है
ये जींवन की धारा हैं
मिटती बनती रहती हैं
इसी चक्र को दुनिया
माया माया कहती हैं 
वो काल नैत्र अंधा,...
हरिहर बिन समझे ही 
मर जाता है,..
मिटने वाली चीजों
को अपना माल बताता है
वो पगला क्या जाने
सुखी रेत को जग मे
यहा कौन बांध पाता हैं
अन्त काल मे,..
मन का पँछी भी 
बिन कहै ही 
उड़ जाता हैं
रोज़ सवेरे उठते है
वो तुझको 
आयना दिखलाता हैं
नाजाने कब
बचपन पर बुढापा
सा छा जाता हैं

कायरो के लिये कोई जमीन नजी होती

कायरो के लिये 
कोई ज़मीन नही होती,..?
न कायरो कही इज्ज़त,..
अहिंसा परमो धर्म,
सच है पर है 
परलोक मे,..
जो हाथ पसारे
तो दूध पिला,..
जो भाषा शास्त्र की
समझे वही समझा
जो बात मिटाने की करे
तो शस्त्र उठा,..
तू कायर की सन्तान नही
तू अपना धर्म निभा,..
वो सोये शेर को छेड़ रहा
तू अपना पराक्रम दिखा,..

क्या घण्टे मंजीरे

क्या घण्टे मंजीरे
बजाते रह जाओगे,..?
या धर्म रक्षा को
कभी शस्त्र भी उठाओगे,
राम कथा हो या कृष्ण कथा
तू उनका सार बता
आज के रावण,कंस के वध को
तू भी कदम उठा,..
नही मिटेगी हस्ती तेरी
तू ये ख़्वाब भूल जा,..
सच जानने की इच्छा है..?
तो तू इतिहास उठा,..
सुकड़ कर रह गया
हरिहर देश तेरा
जो बचा उसे बचा,..

ठगना काम ठग का

ठगना काम ठग का
क्यू फिर ठगता हैं संसार,..
दो पल की जिंदगी
सात जन्म का व्यापार,..
सात जन्म का व्यापार,........
पर झूठे सब अधिकार,..
हरिहर सब जाने 
फिर कौन करे स्वीकार,..
न तेरा न मेरा ये संसार

मैं न बदला

मैं न बदला 
हज़ार कोशिशों के बाद...
मैं इंसान होता
 तो बदलता,..
तेरे विचारों से उतपन्न
मै भाव हूं
मैं कहा मरा,.
करता स्थान परिवर्तन,..
आत्मा मरकर
देह बदले
मैं बदलता
विचार परिवर्तन,..
मैं नही अकेला,..
सब मेरे साथी
सहजता से 
मुझ बिन किसी को 
नींद न आती
मैं हर जीव का साथी
मैं मरता 
तो दुनिया ही
स्वर्ग न हों जाती ?

आजाद परिंदे कहते है

आज़ाद परिंदे कहते है
दीवारों से डरना क्या,.
इक दिन तो गिरना हैं
रोज़ रोज़ का मरना क्या,..१
हम इंसा जैसे नही
जो व्यर्थ बन्धनों में रहता,.
डरा डरा सा रहने वाला....२
खुद को ख़ुदा वो कहता है
तुम क्या जानो इंसानों
आज़ादी किसको कहते है,..
जो खुद ही अविश्वासी
मन मरे घरो में रहते है...३
पावो में बन्धनों की बेड़ियां
घुटन की साँसों को
आजादी वो कहते है
हम आज़ाद परिंदे
नील गगन में उड़ते है.....४
नही इंसानो जैसे
मन ग़ुबार हवा लिये
कायरों से फिरते है
क़ायनात की मर्यादाओं 
का हम दिल से मान धरे,..५
तुम इंसान हर पल
क़ायनात की मर्यादाओं
का क़त्ल करे...६
हम आजाद परिंदे
आज़ादी का सम्मान करें
मिलकर हम परिंदे
 नील गगन नाप धरै...

आओ नया गुलिस्तां तैयार करें

आओ स्वीकार करे
ये फ़िजा हमारी हैं,..
इससे भी प्यार करे
महज़ दो पल के लिये
क्या फूलो को मसलना,..
बस दूर से निहारै 
अबोध बालक की तरह
आ नया गुलसिताँ तैयार करें,...
किसी को मिटाना साहब
हमारी रिवायत नही,...
बिना अपराध का जहाँ तैयार करें,..
आओ स्वीकार करें
ये फ़िजा हमारी हैं
इससे भी प्यार करे
समझ के कागज़ के घरौंदों में हैं
सिसकती जिंदगीया,.
आ सर्द रातो में किसी को
घर से न दर किनार करे,..
माना अमिट हैं कहानी तेरी
कोशिश तो कर,..
तेरी किसी बदनाम 
कहानी को कोई न याद करे