Saturday, 11 January 2020

आजाद परिंदे कहते है

आज़ाद परिंदे कहते है
दीवारों से डरना क्या,.
इक दिन तो गिरना हैं
रोज़ रोज़ का मरना क्या,..१
हम इंसा जैसे नही
जो व्यर्थ बन्धनों में रहता,.
डरा डरा सा रहने वाला....२
खुद को ख़ुदा वो कहता है
तुम क्या जानो इंसानों
आज़ादी किसको कहते है,..
जो खुद ही अविश्वासी
मन मरे घरो में रहते है...३
पावो में बन्धनों की बेड़ियां
घुटन की साँसों को
आजादी वो कहते है
हम आज़ाद परिंदे
नील गगन में उड़ते है.....४
नही इंसानो जैसे
मन ग़ुबार हवा लिये
कायरों से फिरते है
क़ायनात की मर्यादाओं 
का हम दिल से मान धरे,..५
तुम इंसान हर पल
क़ायनात की मर्यादाओं
का क़त्ल करे...६
हम आजाद परिंदे
आज़ादी का सम्मान करें
मिलकर हम परिंदे
 नील गगन नाप धरै...

आओ नया गुलिस्तां तैयार करें

आओ स्वीकार करे
ये फ़िजा हमारी हैं,..
इससे भी प्यार करे
महज़ दो पल के लिये
क्या फूलो को मसलना,..
बस दूर से निहारै 
अबोध बालक की तरह
आ नया गुलसिताँ तैयार करें,...
किसी को मिटाना साहब
हमारी रिवायत नही,...
बिना अपराध का जहाँ तैयार करें,..
आओ स्वीकार करें
ये फ़िजा हमारी हैं
इससे भी प्यार करे
समझ के कागज़ के घरौंदों में हैं
सिसकती जिंदगीया,.
आ सर्द रातो में किसी को
घर से न दर किनार करे,..
माना अमिट हैं कहानी तेरी
कोशिश तो कर,..
तेरी किसी बदनाम 
कहानी को कोई न याद करे

अंहद मे नाद

अंहद में नाद 
नाद से अंहद
मुर्गी से अंडा
जू अंडे से मुर्गी,.
अंहद बिच ब्रह्मांड,..
फिरे जु अनजान,.
भीतर भीड़
फिर भी नादान
अण्डकोष से आरम्भ,
ब्रह्मरंध्र में आराम...
मौन से नाड सुने
नाद हो गुंजायमान
उसकी अंग तरंगी 
फिर भी हैं अनजान....
न भीतर न बाहर
वो छलावा सा बादल
अंहद को हद करता
हद को पार न दरता
पागल में मुस्काता
यू न पार हम पाता
जो कहै मिल गया
उसे दे भटकता......
अंहद सफर 
न कोई गाड़ी
बन मौन ही ले जाता
मौन मन रँगा
बजा डंका
अंहद उतर......

आप ही करणी

आप ही करणी
आप ही भरणी
आप मे 
आप ही समाया
सब जानत
दूध मे घी
घी घर्षण से आया........
सूरज तपता
पर न जलता
बाप को बाप बताया
लटू सी हरिहर
घूमे धरती 
किसी को 
न गिरते पाया..........
हिम् पिघले
बनता पानी
पानी हिम् बनाया
मुर्गी से अंडा
अंड से मुर्गी
अहम जन्म हैं पाया........
मैं ही करता
मैं ही भरता
वहम तुझे 
नजर न वो आया
मर्ग कस्तूरी
माया पुरी
कोई पकड़ न पाया........
चोरी करता 
उपवन भँवरा
क्या आपने कुछ
काम हैं आया
हाथ हथेली
दोनों खाली
मर कर तू पछतायो.......
रोज सवेरे
गुण गुण करता,
पर तु न सुन पायो
अंत काल 
सब छोड़ो
पर तु न गुण पायो.......
आंख खुली तै
देख अंधेरी
क्यो जी मच लायो
हंस उड़ गया
पंख पसारे
काम नही 
कुछ आयो........
मैं मैं तेरी
यही धरि हैं
संग सांस भी
न जा पायो
आप ही करणी
आप ही भरनी.........

Tuesday, 29 October 2019

क्या दाद दे,...

क्या दाद दे,..
दुनिया बनाने वाले की,..
दर्द है तो दवा हैं
दवा काम न करें
तो दुआ हैं
ये हैं तब तमाशा,..
जब सब मे
ख़ुद छुपा हैं,...
कही छपा हैं
कही छुपा हैं
अजीबोगरीब सब,..
क्या उससे छुपा है
कहा तमाशबीनो
का खेल,..
बस फ़क़ीरी में
वो फ़क़ीर हुआ है
वही हँसी हैं
वही गमगीन,..
वो

अज़ब पहेली बना

ख़ुद ही तमाशबीन

मैं न बदला

मैं न बदला
हज़ार कोशिशों के बाद...
मैं इंसान होता
तो बदलता,..
तेरे विचारों से उतपन्न
मै भाव हूं
मैं कहा मरा,.
करता स्थान परिवर्तन,..
आत्मा मरकर
देह बदले
मैं बदलता
विचार परिवर्तन,..
मैं नही अकेला,..
सब मेरे साथी
सहजता से
मुझ बिन किसी को
नींद न आती
मैं हर जीव का साथी
मैं मरता
तो दुनिया ही
स्वर्ग न हों जाती ?

Tuesday, 27 August 2019

दायरा रख जरूरी हैं

दायरा रख ज़रूरी हैं,..
यू बेहिसाब
दुनिया चलती नही,..
न नफ़रत का मंजर बना,..
फ़रेब से इस जहांन मे
किसी की दाल गलती नही,..
झूठ का सूरज चमकता
कहा बरसो के लिये,
बिन विश्वास के
राह बन ती नही,..
बदलना हैं  तो साहब
खुद को बदल,
बिना तेरे तपै दुनिया
चलती नही
माना कि हम
खासो ऐ आम नही,..
पर बिन कचरे के
भी क़ायनात पलती नही,..
बैकार यहाँ दोस्त
कुछ भी नही,..
बिन ताप के
धरती चलती नही